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<title>عشق علیه السلام</title>
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<lastBuildDate>Sun, 22 Nov 2009 12:25:18 GMT</lastBuildDate>
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<title>شاعری در آرزوی اصفهان</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT color=#990000&gt; ( نگاهی به شعر و زندگی حکیم شیخ حسین شهرت شیرازی)&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;                                                              بخش دوم&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;دلزدگی شاعر از هند بی گمان ارتباطی به تنهایی های او و روحیّة مردمان و درباریان هند در روزگاری دارد که پادشاهانش برادرکشی و پدرکشی را حلال می شمرند و شاعر از نداشتن یاران صادق و رفیقان راستین این گونه شکایت می کند:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;زين کشور بي‌صديق مي‌بايد رفت&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;زين جنگل بي‌رفيق مي‌بايد رفت&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;خواهي ره کعبه&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;‌گير، خواهي رهِ دير&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;از هند به‌هر طريق مي‌بايد رفت&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;رباعیّات شاعر چندان زیاد نیست. اگر رباعی برای بیدل قالبی جدّی بوده است و شمار رباعیّات وی حدود چهار هزار رباعی باشد، شمار رباعیّات شهرت امّا به یکصد رباعی هم نمی رسد، امّا رباعیّات شهرت بسیار پیراسته و زیبایند و برخی شان بسیار به یادماندنی اند و از رباعیات بیدل هیچ کم ندارند:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;تن پروردن مقيّد تن شدن است&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;افکندن خود به‌چاه بيژن شدن است&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;دنيا را اهل خويش کردن مردي‌‌ست&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;اهل دنيا شدن زن زن شدن است&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;**&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;در بزم جهان که نيست مأواي درنگ&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;تا چند گهي شيشه شوي گاهي سنگ&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;يا نامردي قبول کن يا مردي&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;يا رومي روم باش يا زنگي زنگ&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;B&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;در ادبیّات ما  شنیدن تفاخر از زبان شاعران بزرگ و کوچک همیشه وجود داشته است و اگر از شاعری چون حافظ و سعدی و بیدل تفاخرهای برحقّی شنیده ایم، گاه تفاخر برخی شاعران درجة دوم زبان فارسی نیز خالی از لطف نبوده است. شهرت نیز بدش نمی آمده است که گاه در کنار بثّ الشکوی ها دل خود را با تفاخری آرام کند و به خود دلداری بدهد:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;تپيدن از دل من آرزو برون آورد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;شكفتن از گره غنچه بو برون آورد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;مبين به‌چشم كمم كز ميان گم شدگان&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;مرا زمانه به ‌صد جستجو برون آورد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;سخن ز قيد خموشي رهايي‌ام بخشيد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;از اين طلسم مرا گفتگو برون آور&lt;/B&gt;د&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;یا:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;کسي ميخانة اشراق را ساقي نشد جز من&lt;BR&gt;ز خاک خم فلاطوني اگر برخاست من بودم&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;امّا این تفاخرها از جنسی نیست که موجب دلزدگی خواننده باشد، بلکه برعکس، گاه بخشی از اندوهان شاعر و دشواری های روزگار وی را حکایت می کند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;گفتیم که حکیم شهرت یک پزشک با تجربه در دربار پادشاهان مغول هند بوده است ، بدیهی ست که بخشی از شعرهای شاعر باید اشاره به شغل حکیم بودن او داشته باشد:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;شهرت آخر ترش‌رويي درد ما را شد دوا&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;مي‌توان صفراي عاشق را به ‌ليمويي شكست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;علاج درد نياز از دوا نمي‌آيد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;شكسته‌بندي دل كار موميايي نيست&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;چشمش نگاه را چو به ‌مي‌نوشي آورد&lt;BR&gt;از گرد سرمه داروي بيهوشي آورد&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;نام نگه مبر که جوابت نمي‌دهد&lt;BR&gt;هرگز مگوي سرمه که خاموشي آورد&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;BR&gt;&lt;/STRONG&gt;بخشی از تجربیّات پزشکی شاعر حاوی اطّلاعاتی تازه است. به عنوان مثال بنده می دانستم که در قدیم برای آن که صدای کسی را خاموش کنند در دهانش سرمه می ریختند و سرمه به تارهای صوتی لطمه می زند و صدا به خوبی شنیده نمی شود، امّا نشنیده بودم که از گرد سرمه داروی بیهوشی درست کنند و به طور قطع اشاره شاعر در بیت بالا اشاره به همین موضوع است. یا این بیت را ببینید:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;کي به‌فکر صندلش از سر توانم وا کنم&lt;BR&gt;من که عمري زندگاني کرده‌ام با درد سر&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;که نشانگر آن است که هندوها در قدیم به پیشانی شان خمیری از صندل و زعفران می مالیدند تا سردرد را تسکین دهد و هنوز هم در هند این سنّت وجود دارد و زنان در میان دو ابرو و مردان بر پیشانی شان خمیری رنگی می مالند که امروزه دیگر بیش از آن که به کار رفع درد سر بیاید، یک علامت و نشانه برای هندو بودن است و به آن تیلک می گویند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;برخی از سنت های رایج هند نیز در شعر شاعر راه یافته است که فهم آنان برای غیر مردم هند اندکی دشوار است. از جمله در یکی از ابیات غزل های شهرت اشاره ای به جشن &quot;هولی&quot; رفته است که جشن رنگ پاشیدن به روی هم است و در این روز مردم هند آزادند که به روی هم رنگ بپاشند و همه از این کار اظهار شادی و رضایت می کنند. این جشن هنوز هم در هند و در پایان زمستان و شروع بهار با شکوه خاصی برگزار می شود:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;چار موسم موسم هولي‌ست در بزم جهان&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;چون حنا، سبزان هند از بس‌كه رنگ انداختند&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;**&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;یا این بیت که اشاره به گفتن &quot;واه واه &quot; برای تشویق در میان هندیان دارد. هنوز هم در مراسم شعرخوانی و موسیقی مردم هند با گفتن &quot;واه واه&quot; که همان &quot;به به&quot; ماست، شاعران و هنرمندانشان را تشویق می کنند:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;يک جلوه کرد سرو قيامت‌خرام تو&lt;BR&gt;تا حشر بر لبم سخن واه واه ماند&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;BR&gt;&lt;FONT size=3&gt;هند با طاووس هایش شهرة دنیاست و شهرت با مشاهده طاووس های هند آن را ردیف غزل خود می کند و این گونه مضمون آفرینی می کند:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;چون شيشه دلم مجمع يک هند پري شد&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;آورد ز بس تاخت به من ‌لشکر طاووس&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;جاري‌ست ز بس حکم زميندار خرامش&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;معمورة هند است همه کشور طاووس&lt;BR&gt;تا کي نکشد شعله سر از جیب بهارش&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;خاکستر هند است پر از اخگر طاووس&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;از سفله سرافراز کشد منّت دنيا&lt;BR&gt;از ساية دم چتر بود بر سر طاووس&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;در شبه قاره هند گل های کاغذی با رنگ های مختلف بسیار مشهورند. این گلها را در جنوب و شمال ایران نیز دیده ام امّا گل کاغذی هند و پاکستان بخشی از طراوت و زیبایی شبه قاره را بر دوش کشیده است. مضمون آفرینی شاعر از گل کاغذ یا همان گل کاغذی بی ارتباط با تماشاهای وی و پیش چشم بودن این گل در نزد شاعر نیست:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;ز نامة تو ز بس بوي وصل مي‌آيد&lt;BR&gt;هميشه از گل کاغذ گلاب مي‌گيرم&lt;BR&gt;&lt;/STRONG&gt;یکی از واژگانی که در ماوراءالنهر امروز و در میان مردم فارسی زبان بخصوص تاجیکان کاربرد زیادی دارد کلمة &quot;پخته&quot; است که ما ایرانیان به جای آن از کلمة &quot;پنبه&quot; استفاده می کنیم. دیدن این کلمه در شعر شهرت شیرازی برایم سؤال انگیز شد، از آن رو که فارسی زبانان امروز هند و جماعت دانشگاهی آن با این کلمه احساس آشنایی ندارند. شاید حشر و نشر شاعر در آن روزگار با برخی از شاعران ماوراءالنهر سبب آوردن آن شده باشد:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;به‌روي کار افتاده ست از بس پختة مردم&lt;BR&gt;نديدم در قماش هيچ کس گردد رفو پنهان&lt;/B&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;B&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;واژه تماشابین به معنی بیننده هم از واژگانی است که تا امروز در تاجیکستان و مناطق فارسی زبانان فرارود کاربرد فراوان دارد که در بیت زیر از شهرت آن را می بینیم.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;همچنین واژگانی چون برهمن و هندو و ... نیز از واژگانی ست که به فراوانی با زندگی مردم هند گره خورده است:&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;نظربازانه هركس ديد دنيا را پرستيدش&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;&lt;FONT size=3&gt;تماشابين اين بتخانه هركس شد برهمن شد...&lt;/FONT&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;ادامه دارد... </description>
<pubDate>Sun, 22 Nov 2009 12:25:18 GMT</pubDate>
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<title>دگر شدند حریفان و من دگر نشدم</title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-228.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt;این روزها قطار مرگ سرعت گرفته است و مسافرانی که نگاهشان با تو آشناست بیشتر شده اند. همین چند روز پیش استاد صبحدل،  موذن آن اذان جاودانه و قاری قرآن و استاد آواز و معلم اخلاق رفت. نخستین بار در تبلیغات قرارگاه کربلا در جنوب حضرت حجتی پریشان مرا به ایشان معرفی کردند و بعد سال ها در رادیو معارف به خدمتشان می رسیدم و بخصوص در اوقاتی که خودشان تلفن می کردند که برای سحرهای رادیو متن ادبی بنویس  و آن روزها سرود روشنی می نوشتم و در انتهای شب و گاه برنامه های ویژه ای چون سحرهای رادیو. چقدر پیر شده بود استاد و آن نگاه دوست داشتنی و آن لبخند همیشگی در پشت چهره ای تکیده و خسته از سال ها کار و تلاش گم شده بود. خدایش بیامرزد و یادش سبز.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt;از روحانی ترین و هنرمندترین جانهای شیفته و عاشق بود. حضرت آیت الله سید مرتضی نجومی که شاید آخرین بار در کرمانشاه و همراه با استاد محمدجواد محبّت و محمّدسعید میرزایی عزیز خدمتشان رسیدیم در شبی که برق رفته بود و شمعی در خانه نبود و استاد تنها بود و ما در زیر نور چراغ دلش نشستیم و حکایت کردیم از شعر و خط و آن شب استاد با طنزی دوست داشتنی سخن می گفت و با تواضعی از جنس حقیقت و شیدایی و سخن ما را تکرا ر می کرد و غلوش را افزون که من جهانی هستم افتاده در گوشه ای! و می خندید و ما در زلالی آن سیّد روحانی گم شده بودیم. رفت. آن سیّد هنرمند روحانی عاشق نیز رفت. که به راستی جهانی بود افتاده در گوشه ای.خط استاد محشر بود و تواضعش محشرتر. ادبیاتش ناب بود و زلالی اش ناب تر. &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt;از جنس آن دو بزرگمرد که حکایتشان رفت یکی هم استاد بزرگ ما محمود شاهرخی جذبه بود. شاعری که با زلزله بم در تهران شکست و چقدر از خویشاوندانش در آن زلزله مهیب رفتند و بعد از آن دیگر خنده های استاد کمرنگ شد و آن همه طنزها و شوخی ها و بذله گویی ها با صدای بلند که اگر کوک می شد ساعتها باید می خندید و می خندیدی. گریه خندی داشت استاد. لحظه ای بارانی بود و لحظه ای آفتابی. آن سال ها شاهرخی را با این مصرع بیشتر می شناختیم که : دگر شدند حریفان و من دگر نشدم ... هم استاد سبزواری و هم استاد مشفق و هم چند تن دیگر از آن استقبال کرده بودند. و تکیه کلامش عزیزجان بود که تکیه کلام اوستا هم همین بود و پاتوق استاد در شورای شعر و صبح زود می آمد و در یک سالی که در شورای شعر در خدمت شان بودیم زودتر از همه می آمد و به خاطر بیماری زودتر از همه می رفت. دلش آنقدر شکسته بود که مثل یک بچه زود به گریه می افتاد. وقتی شعری می شنید و مثلا نامی از کربلا و امام حسین (ع)و حضرت زینب (س) زودی می شکست. یا اگر بیتی زیبا می شنید چند بار ماشاءالله را تکرار می کرد.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt; همین چند لحظه پیش نشسته بودم کنارش در شورای شعر و  با خنده حکایت و ماجرای دعوتش از استاد محبّت در دو دهه قبل را برایم تعریف می کرد. آن سالها که کرمانشاه مرتب موشک می خورد و استاد  شام مفصلی پخته بودند در خانه و منتظر مهمان و دم غروب استاد محبت با یک نان بربری آمده بود و گفته بود که شام من همین است و همان را خورده بود و شام ها مانده بود. و آن را چه با آب و تاب برایم تعریف می کرد و حکایت های دیگر که خیلی شان از جنسی دیگر بود. &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt;شاعران نمی میرند . آنها بازمی گردند برای نقل حکایت هاشان و خواندن دوباره شعرهاشان. دیشب تصاویر  مدینه و مسجد شجره پخش می شد با شعر شهید احمد زارعی که خاطره اش این روزها زیاد با من است: باز امشب هوس گریه پنهان دارم...میل شبگردی در کوچه باران دارم ...&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt;دوست دارم تلفن بزنم به تمام مردگان . به ترنج از همین گوشی موبایل ایرتل هند و ماجرای پیوند کبدش را تعریف کنم که گفته بودم نگران نباش جگر همین کاکایی را در می آوریم و پیوند می زنیم به تو. و او بعد از آن همه روزها و شبهای خستگی و درد خندیده بود. دوست دارم تلفن بزنم به صفا لاهوتی و سرکارش بگذارم و بگویم من بیگی ام چرا به قزوه چیزی نمی گویی . یا زنگ بزنم به زندگان با معرفت و گلایه کنی از روزگار و کمی دلتنگ شوی از دست دیگرانی که گاه میان دوستان شاعر را شکراب می کنند و همین حالا گوشی را بدهم به علی معلم و بگویم استاد شاهرخی پشت خط است. بیا خداحافظی کن. یا بروم به کنگره  شعری و استاد سبزواری را وادار کنم که وقتش را بدهد به استاد گرمارودی و استاد گرمارودی را که تعارف تکه پاره کند برای استاد سبزواری و نمی دانم کجا بود که استاد گرمارودی یک عالمه احترام و تواضع نثار استاد سبزواری کرد.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt; دلم برای خیلی ها تنگ شده است این شبها و دلم به یاد خیلی هاست این روزها. حتی دلم می خواهد آنهایی که حوصله شان را سربرده ام را ببینم و سر به سرشان بگذارم و خطوط سیاسی را قاطی کنم و بگویم مگر خاتمی راست نبود؟ راستی ناطق چپ است یا هاشمی؟  و از این بازی ها. &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=4&gt;&lt;STRONG&gt; هی استاد شاهرخی! می بینی که ما هنوز اینجا درگیریم . هنوز دغدغه هایمان تمام نشده است. به سلامت بروی استاد! شادان بروی شاعر بزرگ! حق پشت و پناهت باشد عزیزجان!&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 17 Nov 2009 05:34:18 GMT</pubDate>
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<title>شاعری در آرزوی اصفهان</title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-227.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;                                                                                                                                             بخش نخست&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;  (نگاهی به شعر و زندگی حکیم شیخ حسین شهرت شیرازی)*&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;در ادبیات هر سرزمینی همیشه شاعرانی بوده و هستند که به دلایلی به درستی مطرح نشده اند و گرد فراموشی بر آثار و نام شان نشسته است و بعد از قرنها شاید تنها یک اتّفاق توانسته است نام شان را دوباره بر سر زبانها بیندازد و گاه جاودانه کند. منظورم از جاودانه شدن تنها چاپ یک اثر در شکلی نفیس و داشتن دیوانی قطور به نام حکیم فلان و بهمان نیست، که از این دست آثار در گنجینة ادبیّات فارسی زبانان کم نیست. شاید در روزگاری عدم حضور قلّه های جدّی شعر و ادب، یک شاعر نسبتا خوب را نیز برجسته کند و آثارش را به رخ بکشاند، امّا در روزگاری بسیاری از شاعران خوب و جدّی در سایة نام شاعری بزرگتر از خود قرار بگیرند و به چشم نیایند. به عنوان مثال در حیاط حافظیّه و درست وقتی از پلّه های مقبره حافظ پایین می آیی به قبری ساده برمی خوری که نام شاعری بزرگ و آشنا را در خود  دارد. اهلی شیرازی! شاعری که در کنار قلّة حافظ تقریبا گم شده است. شهرت شیرازی نیز اگرچه از دوستان نزدیک بیدل دهلوی و معاصر این شاعر بوده است، امّا با همة زیبایی های شعرش در زیر سایه دو چیز خود را گم کرده است، یکی بیدل دهلوی و دیگری شغلش که حکیم دربار بوده است.آن هم بزرگ حکیمان دربار و از این رو نگاه مردم و اهل فرهنگ و سیاست بیش از آنکه متوجّه جلالت شاعری او باشد، بی اختیار به سمت طبابت وی می رود. از این رو حکیم شیخ حسین شهرت شیرازی را نیز باید در شمار مظلومان ادب فارسی به حساب آورد، اگرچه دوری از ایران و هجرتش به هند نیز این مظلومیّت را تا حدّی مضاعف کرد. یکی دیگر از دلایل غریب ماندن این شاعر در ایران شرایط اجتماعی و ادبی دورة این شاعر بود که تقریبا نیم قرن دیر به هند رسیده بود و از قافلة شاعرانی چون کلیم و سلیم و صائب و ... عقب مانده بود. چرا که در دورة  شاه جهان، هند مهد شعر و ادبیّات  بود و دورة طلایی خود را سپری می کرد، امّا در دورة اورنگ زیب، شعر از دربار بیرون رانده شده بود و حدیث و قرآن و لشکرکشی های شاه عالمگیر جایی برای ادبیّات و شعر باقی نگذاشته بود. اینها همه دست به دست هم داد تا شاعری چون شهرت شیرازی چندان به چشم نیاید و امروز نیز در ایران و حتّی در سرزمین مادری اش – شیراز-  نامی غریب باشد، امّا همواره روزگار بر مدار نامرادی نمی گردد و گاه به پایمردی و کوشش محقّق و پژوهشگری راستین، گَرد گمنامی  از چهره شاعری کنار می رود، چنان که در ایران  اشعار حزین لاهیجی مورد سرقت شخصی با تخلّص غوّاص! قرار گرفته بود و با کوشش شاعر و پژوهشگر ارزنده ادبیّات، دکتر محمّدرضا شفیعی کدکنی حزین دوباره جایگاه و منزلت اصلی خود را به دست آورد و به مردم ایران به درستی معرّفی شد...&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;حکیم شیخ حسین شهرت شیرازی بیشترین سالهای عمرش را در هند گذرانده و تا پایان حیات خویش در آرزوی دیدن وطن در سوز و بی تابی زیسته است. بیشتر تذکره نویسان سال ورود او به سرزمین هند را دوره پادشاهی اورنگ زیب(1068 -1118 ه) می دانند. وفات شاعر در سال 1149 ه روی داده است و چند ماده تاریخ وفات هم تصریح دارد که وی در این سال به دیار باقی شتافته است. امّا از سال ولادتش اطّلاع دقیقی در دست نیست. او در شعرهایش به موی سپید و بیماری اش نیز اشاره دارد و برخی از تذکره نگاران آورده اند که وی نیز چون امیرخسرو و بیدل روزگار هفت پادشاه را به چشم دیده است. به نظر می رسد که وی در دهة ششم قرن یازدهم و تقریبا همزمان با آغاز پادشاهی اورنگ زیب متولّد شده باشد و ورودش به هند می تواند مربوط به سال های میانه حکومت اورنگ زیب باشد، چرا که برخی از منابع نیز ورود او به هند را بعد از اورنگ زیب و همزمان با پادشاهی  اخلاف اورنگ زیب همچون معظّم شاه و اعظم شاه می دانند. اگرچه این پادشاه اخیرتنها چند ماه حکومت می کند و در جنگ قدرت با برادر بزرگش (معظّم شاه) کشته می شود،  امّا صاحب &quot;سفینه هندی&quot; و &quot;بزم تیموریه&quot; آورده اند که شیخ حسین شهرت و بیدل دهلوی و حاجی اسلم سالم  و میرزا محمّد زمان از شاعران دربار او بودند. امّا باید دانست که  صاحبان این سفینه ها دقـت لازم را برای بیان شرح حال این شاعران بخصوص بیدل نداشتند و اطلاق شاعر دربار به بیدل نه از آن روی بوده است که بیدل شعرش را وسیله درآمد کند بلکه وی به شغل پدرانش سپاهیگری علاقه داشت و پس &lt;B&gt;از ازدواج در سال ۱۰۷۹ ه به جستجوی کسب معاش برآمد ، در خدمت شهزاده اعظم شاه پسر اورنگزيب ، پيوست و پيشه سپاهيگری نياکان را تجديد کرد ، بیدل در نظر داشت موازنهً ميان کار روحی و فعاليت جسمی ايجادکند. &lt;/B&gt;&lt;B&gt;وی در دستگاه اعظم شاه به منصب پنجصدی نايل آمد و درطباخ خانه شاهزاده به حيث ناظر گماشته شد.&lt;/B&gt;با این وصف ورود شیخ حسین شهرت به هند می بایست قبل از آن و به طور یقین در همان دورة پادشاهی اورنگ زیب اتّفاق افتاده باشد. ضمن آن که بیدل خیلی زود دربار این پادشاه را ترک کرد و با حمایت های شکرالله خان - والی میوات- توانست خانه ای و گوشه ای دنج در دهلی برای خود اختیار کند و فارغ از مشکلات روزمره نام خود را به عنوان شاعری بزرگ جاودانه کند، امّا شیخ حسین شهرت شیرازی شغل اوّلش پزشکی دربار بود و وی در این حرفه تا بدانجا رسید که بعدها در دورة پادشاهی فرّخ سیر به وی، لقب حکیم الممالک و عنوان چهارهزاری** دادند. با این اوصاف وی شاعری را دستمایة مدح کسی نکرد و در تمام دیوانش نیز جز مدح مولاعلی(ع) و فرزندانش مدح کسی را نمی توان سراغ گرفت. &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;من به ضرورت ویراستاری و نگرش دوباره به متن و تصحیح برخی از اغلاط راه یافته به آن ، و آماده سازی کتاب برای چاپ، سعادت آن را داشتم که با دقّت و حوصلة تمام سه بار همة دیوان را بخوانم و این خوانش و ویرایش بیش از یک سال وقت برد و امروز خدا را شاکرم که این دیوان پیش روی شماست.&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt; پژوهشگر ارجمند دیوان شهرت شیرازی جناب دکتر غلام مجتبی انصاری در نامه ای محبّت آمیز از من خواستند که نامم همراه با نام ایشان بر جلد این تحقیق آورده شود، امّا انصاف نبود و حق همین بود که تنها نام ارجمند  ایشان بر جلد این دیوان بیاید و زحمات بی دریغ شان را به همراه درودی و سپاسی پاسخ گو باشم و خواسته شان را به گونه ای دیگر بر چشم نهم و در ثواب آن با نوشتن این مقاله و اشاره ای به برخی نوآوری ها و ویژگی های شاعر سهیم شوم، شاید اگر حوصله ای باشد در فرصتی، گزیده ای از غزلیّات شاعر را در دفتری مختصر با سرسخنی همراه با یادکرد زحمات این پژوهشگر ارجمند به ایرانیان معرفی کردم، و شاید هم این دیوان علاوه بر هند در ایران نیز فرصت معرّفی و چاپ را با همین شکل پیدا کرد.&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;اینک فرصتی ست تا در جای جای اشعار این دفتر عمیق شویم و برخی از جلوه ها و زیبایی های سخن شاعر را به رخ بکشیم. بیش از همه مضمون آفرینی های سبک هندی و خیال های مینیاتوری و ظریف را رصد می کنیم. این ابیات را ببینید:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از سيه‌رويان اگر مي‌بود خودبيني به‌جا&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;كس نمي‌بيند چرا هنگام شب آيينه را&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;یا این بیت :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از بس شده‌ست سنگ گرانجاني‌ام سبك&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;باشد فلاخن آمد و رفت نفس مرا&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;این نگاه های ظریف و موشکافی های دقیق در این بیت به خوبی خود را نشان داده است:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از كفر سر زلف تو بي‌چاك دلي نيست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هر شانه‌اي از موي تو زنّار به‌دست است&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;اگرچه شعرهای این شاعر همه یکدست نیست و با حوصله بیشتر می شد از میان حدود هشتصد غزل شاعر یکصد تا دویست غزل خوب را جدا کرد، امّا برخی از بیت های این شاعر از شعر بزرگانی چون صائب و کلیم هیچ کم ندارد و اگر برای استادان ادبیّات و شاعران فارسی زبان بیت های زیر را بخوانی بسیاری خواهند گفت این از حیث قوّت و سبک و سیاق شعر صائب است:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;شب خواب حيات از بس‌كه با صبح است هم بالين&lt;BR&gt;جوان پهلو به‌پهلو تا بگردد پير مي‌گردد&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;در حقيقت هركه ممسك نيست دنيادار نيست&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;تا نگردد سخت رو كي قطره گوهر مي‌شود &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt; مرگ ارباب هنر بي‌كارفرما بودن است&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;فرض كردم زنده شد ياقوت، مستعصم كجاست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;اگر چه کلمه &quot;کارفرما&quot; کمی شعری نمی نماید، امّا مضمون، ظریف و بیت، به یادماندنی ست.&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در ابیات زیر نیز ظرافت و لطافت خاص سبک هندی را می توان تماشا کرد:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;ظالم از پهلوي مظلوم شود كامروا&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;تير هر كس به‌هدف خورد پرش از خود نيست               &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;توان ز دانة انگور فیض میکده برد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;که در پیالة این قطره آب دریاهاست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;چون متاع توتيا در شهر كورانم كساد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;كم خريداري مرا بسيار ارزان كرده است&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;حاجيان از راه خرج زر ز بس دل مرده‌اند&lt;BR&gt;کعبه‌از بر برنمي‌آرد لباس ماتمي&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;همچو شهرت ضعف من در نامه گر انشا شود&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;قوّت پرواز از بال کبوتر مي‌پرد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;**&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;نه تنها بهر عزلت هر کسي کاشانه‌اي دارد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;  کمان هم از براي گوشه‌گيري خانه‌اي دارد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;یا این بیت که یادآور نگاه داشتن آیینه در پوششی از نمد در روزگاران قدیم بوده است:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;لباس مردم درويش نيست بي‌دل روشن&lt;/B&gt;&lt;BR&gt;&lt;B&gt;هميشه در نمد خود قلندر آينه دارد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;BR&gt;&lt;STRONG&gt;این بیت نیز اشاره زیبایی به میوه &quot;به&quot; یا &quot;بهی&quot; دارد که به دور خود پوششی نمدگون دارد:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;جز قلندر مشربي کي در لباسی تن دهم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;در رياض زندگي چون بِه ‌نمدپوشم گذار&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;زبان شهرت در بسیاری از غزل هایش با سلاست و روانی همراه است و گاه که این بلاغت و سلاست با خیال همراه می شود، بیت هایی به یادماندنی خلق می شود و اگر تنها به عدد انگشتان دو دست از این ابیات در دیوان شاعری باشد، کافی ست تا در اذهان مردم فارسی زبان  نامش جاودان بماند. شعرهایی از این دست در حدّ ضرب المثل زیباست، یا استعداد ضرب المثل شدن دارد:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;چو آمدي به‌جهان توشة رهي بردار&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;كه هر كه آمده از بهر رفتن آمده است&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;بس‌که از كشتن هم اهل جهان خوشوقت اند&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هيچ كم شادي اين طايفه از ماتم نيست&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;ميان ما و تو اي لاله فرق بسيار است&lt;BR&gt;تو از براي خودي داغ و من براي کسي&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;البتّه در این میان ابیاتی که مطلع یک غزل اند به علّت داشتن قافیه و ردیف و موسیقی بالاتر از شانس بیشتری برای ضرب المثل شدن برخوردارند. این ابیات را ببینید:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هر که آمد به جهان با غم ایّام آمد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;صبح تا رفت نفس تازه کند شام آمد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;**&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;شيشه شد خالي و جام ما پر از صهبا نشد&lt;BR&gt;حجّ اين ذي‌الحجّه هم رفت و نصيب ما نشد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;يار ما بد نيست امّا قوم و خويشانش بدند&lt;BR&gt;يوسف ما هر قدر خوب است اخوانش بدند&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;دل سياه به‌کار نفس نمي‌آيد&lt;BR&gt;ز کوه سرمه صدا باز پس نمي‌آيد&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;بخشی از شعرهای شاعر شعرهای اعتقادی و دینی اوست:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از غدير خم شود لبريز صهبا ساغرش&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هركه فهميده‌ست شهرت ساقي ميخانه کيست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;شهرتِ لب تشنه با پامردي مهر علي (ع)&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;آخر از هندوستان تا كربلا ديديم رفت&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;گردد براي دُرّ نجف طينتش صدف&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هر كس كه دل به‌خاك در بوتراب بست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;به‌رنگ قبله‌نما چشم انتظار نگاهم&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;نظر به‌هيچ رهي جز ره حجاز ندارد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;خراب ميکده‌ام محتسب بگوي به‌ناصح&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مرا ز رفتن بیت الحرام باز ندارد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از هند تيره شکوه کجا بي‌صدا برم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;فرياد سرمه را به‌خموشي کجا برم&lt;BR&gt;کردم ز خون ديده و دل عرضة رقم&lt;BR&gt;خود قاصدم ز هند که تا کربلا برم&lt;BR&gt;يارب عنايتي که ز هند اين شکسته را&lt;BR&gt;بهر طواف پنجم آل عبا برم&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;چون طينت عبيد تو از خاک کربلاست&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;از خاک کربلاست چو اصل نهال من&lt;BR&gt;شهرت دخيل قايم آل نبي شدي&lt;BR&gt;کردي تو سرفراز مرا خوش به‌حال من&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;ناله ها و بثّ الشکوی های شاعر نیز شنیدنی ست و در این دلتنگی ها و شکوه ها، شکوه از هند بیشتر به چشم می آید، اگرچه او از خویش نیز بارها شکوه کرده است:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;ز شهرت ناله شد خاموشي‌ام فرياد از شهرت&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مرا رسواي عالم كرد شهرت، داد از شهرت&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;**&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;آرامگاه خلق ز بي‌نوري است شب&lt;BR&gt;هندوستان ز قحطي آدم بهشت شد&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;اگر بسیاری از شاعران به قول معروف فیل شان یاد هندوستان می کند، شهرت از آنهاست که دائم فیلش یاد اصفهان می کند و این دلتنگی ها آنقدر است که می توان به شهرت حتّی شهرت اصفهانی گفت! و عجیب آن که این گره خوردگی با اصفهان بیش از همه به سرمة آن مربوط می شود، شاید شاعر ما در جوانی دلش را در گرو سرمه چشمی در اصفهان گذاشته است:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;در خزان هند تا كي نوبهارم بگذرد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;چند در تاريكي شب روزگارم بگذرد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مي‌كند هركس كه دارد چشم استقبال آن&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;در صفاهان سرمه‌واري گر غبارم بگذرد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;گريه سر کردم سواد هند را سيلاب برد&lt;BR&gt;يک صفاهان سرمه را در پيش چشمم آب برد&lt;BR&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;سرمة تيرگي هند خموشم دارد&lt;BR&gt;چه عجب نالة من گر به‌صفاهان نرسد&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;هر كه مي‌خواهد نبيند تيره روزي‌هاي هند&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;بايدش چون سرمه در عين صفاهان بود و بود&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;**&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;کرده‌ام يک عمر تحصيل سيه روزي ز هند&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;مي‌برم اين سرمه تا در چشم اصفاهان کشم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt; دل در گرو اصفهان بستن شاعر را در سرمه سرودهای او دیدیم. بسیاری از ابیات شاعر نیز اشاره به شیرازی بودن و فارس بودن او دارد و آرزوی دیدن آن سرزمین نیز هماره با شاعر بوده است: &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;ز فارس كسب سخن هر كه كرد مي‌فهمد&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;كه فارسي همه شهري‌ست روستايي نيست&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;**&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;چشم آن دارم که گردم هالة ماه چراغ&lt;BR&gt;رخصت پروانگي يابم گر از شاه چراغ&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;                                                           ادامه دارد...&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;*  این مقاله بخشی از مقدمه دیوان شاعر است که بزودی منتشر می شود.( این مقاله را در سه بخش تقدیم تان می کنم)&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;*&lt;/STRONG&gt; *چهارهزاری مقامی والا در روزگار پادشاهان مغول هند بوده است و امیری که به وی این منصب را اعطا می کردند زیر دست خود چهارهزار  پیاده نظام داشته است و هزینه های آنان از راه بخشیدن قطعه زمینی یا روستایی تامین می شده است. منصب های بالاتر چون پنجهزاری و شش هزاری برای امرای عمومی و هفت هزاری به ندرت برای امیران با لیاقت و نه هزاری برای شاهزاده ها و استثنائا برای ولیعهد داراشکوه منصب دوازده هزاری وجود داشته است. منصب های پایین تر از دویستی را ذکر نمی کردند و بالاتر از آن در حد سیصدی و چهارصدی و ... را در وقایع درباری ذکر می کردند. همچنین این صاحب منصبان باید در موقع جنگ به همان اندازه سوار یا پیاده به جنگ گسیل می کردند.&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 15 Nov 2009 13:05:18 GMT</pubDate>
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<title>شام گیسوها به خیر</title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-226.aspx</link>
<description>  
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;ياد چرخش‌ها و حق حق‌ها و هوهو‌ها به خير &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;صبح ابروها مبارک، شام گيسوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;زادروز صحبت پيغمبران راستين&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; در سماع قدسي بال پرستوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;گود گلريزان و چرخاچرخ مردان غيور &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;ضرب مرشد، پاي زنگي، زور بازوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در قدمگاه ولايت راه مشتاقان سپيد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در غروب بي پناهي آه آهوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;شور شبگير نشابور از هميشه شسته تر&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;بانگ قوّالان مرکّب، حال هندوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;روز زنبور عسل، سرشار از باران وحي&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;بخت گل‌ها آفتابي،  وقت کندوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در طلوع صادق چشمان دختر بچّه‌ها &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;ذوق معصومانة برق النگوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;خندۀ رنگين کمان در آسمان چشم‌ها&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;گريه پنهاني مهتاب در جوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در شبستان تغزّل روي ايوان بهار &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;گريه خند شمعداني‌ها و شب بوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;لنج‌ها ي روشنايي غرق شور و شروه‌اند&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در خليج پارسايان عصر جاشوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;دست افشاندم از اين مرداب لبريز از حباب&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;نو شدن در شام مرگ انديشي قوها به خير&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;I&gt;                                                                 مرداد ماه 1386&lt;/I&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 09 Nov 2009 11:24:18 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>اندکی گر مثنوی تأخیر شد ما را ببخش </title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-225.aspx</link>
<description>&lt;B&gt;&lt;/B&gt;  
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;بعد تو چندین قیامت دیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;مِهر مُرد و ماه  در زنجیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;راوی این قصّه از یعقوب یادی هم نکرد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;یوسف این قصّه دیگر پیر شد ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;نازنینا عدل ما را کشت، تو دیگر مکش  &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; مهربانا ظلم عالمگیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;از حدیث قدسی چشمت کسی شرحی نخواند&lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;مصحف زلف تو بد تفسیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;ما ندانستیم رازعقل و سرّعشق چیست&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;عقل مُرد و عاشقی تحقیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;تیرمان بر سنگ خورد و خون مان بر خاک ریخت&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;سهم مان دنیای پر نخجیر شد، ما را ببخش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;مدّتی گر عاشقی از یاد رفت از ما مرنج&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;B&gt;اندکی گر مثنوی تأخیر شد ما را ببخش &lt;/B&gt;&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;                                     ۱۴ آبان ماه ۱۳۸۸&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 05 Nov 2009 11:54:18 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>داغ ، داغ است ولي داغ برادر... قيصر!</title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-224.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;گرچه من می شکنم در خود يكسر، قیصر!&lt;/FONT&gt;&lt;A href=&quot;http://www.mehrnews.com/fa/newsdetail.aspx?NewsID=578897&quot; target=_blank&gt;&lt;/A&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;مرگ حق است، تبسّم کن و بگذر، قیصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT color=#330000&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot;&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;مرگ، پايان كبوتر نيست، &lt;/STRONG&gt;&lt;STRONG&gt;وقتي&lt;/STRONG&gt;&lt;STRONG&gt; بي بال&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;تا خدا پل زده اي مثل كبوتر، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;نام تو شهره تر از قاف شده ست اي سيمرغ&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;باز هم پر بگشا در خود بي پر، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;&lt;A href=&quot;http://images.google.com/imgres?imgurl=http://www.hamshahrionline.ir/images/upload/news/pose/ghaisra-aminpour2.jpg&amp;imgrefurl=http://www.hamshahrionline.ir/News/%3Fid%3D36799&amp;usg=__w4O-QXdfQjHa7Ak0Hj1TC8BAEzo=&amp;h=302&amp;w=300&amp;sz=32&amp;hl=fa&amp;start=72&amp;um=1&amp;tbnid=njnAY9RixlZNbM:&amp;tbnh=116&amp;tbnw=115&amp;prev=/images%3Fq%3D%25D9%2582%25DB%258C%25D8%25B5%25D8%25B1%26ndsp%3D20%26hl%3Dfa%26lr%3D%26sa%3DN%26start%3D60%26um%3D1&quot;&gt;&lt;/A&gt;
&lt;P dir=rtl align=right&gt;&lt;A href=&quot;http://images.google.com/imgres?imgurl=http://www.hamshahrionline.ir/images/upload/news/pose/ghaisra-aminpour2.jpg&amp;imgrefurl=http://www.hamshahrionline.ir/News/%3Fid%3D36799&amp;usg=__w4O-QXdfQjHa7Ak0Hj1TC8BAEzo=&amp;h=302&amp;w=300&amp;sz=32&amp;hl=fa&amp;start=72&amp;um=1&amp;tbnid=njnAY9RixlZNbM:&amp;tbnh=116&amp;tbnw=115&amp;prev=/images%3Fq%3D%25D9%2582%25DB%258C%25D8%25B5%25D8%25B1%26ndsp%3D20%26hl%3Dfa%26lr%3D%26sa%3DN%26start%3D60%26um%3D1&quot;&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; size=3&gt;&lt;IMG style=&quot;BORDER-RIGHT: 1px solid; BORDER-TOP: 1px solid; BORDER-LEFT: 1px solid; WIDTH: 174px; BORDER-BOTTOM: 1px solid; HEIGHT: 172px&quot; height=116 src=&quot;http://t0.gstatic.com/images?q=tbn:njnAY9RixlZNbM:http://www.hamshahrionline.ir/images/upload/news/pose/ghaisra-aminpour2.jpg&quot; width=115&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;&lt;A href=&quot;http://images.google.com/imgres?imgurl=http://picsun.persiangig.com/image/233.jpg&amp;imgrefurl=http://mohammad_esfahani.mihanblog.com/&amp;usg=___KqDAK7AjGNR7YsGqNLCYws_Y9o=&amp;h=583&amp;w=379&amp;sz=130&amp;hl=fa&amp;start=11&amp;um=1&amp;tbnid=FiUwxlrGIthf_M:&amp;tbnh=134&amp;tbnw=87&amp;prev=/images%3Fq%3D%25D9%2582%25DB%258C%25D8%25B5%25D8%25B1%26hl%3Dfa%26lr%3D%26sa%3DN%26um%3D1&quot;&gt;&lt;/A&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;مرگ مرگ است ولي مرگ تو مرگي دگر است&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;داغ ، داغ است ولي داغ برادر... قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;راستي مرگ چه جوري ست؟ مرا مي بيني؟&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt; چه خبرداري از عالم ديگر، قيصر!؟&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;نقدهايت همه غوغا بود غوغا، &quot;سيد&quot;!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;شعرهايت همه محشر بود ، محشر، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;جامة خاك به تن كردي و يادم آمد&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;از شب خون، شب آتش، شب سنگر، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;شعرهاي تو همه معني قرآن بودند&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;&quot;آيه&quot; اي داري چون سورة كوثر، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;تيغ مي چرخد و من سينه زنان مي گريم&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;در دلم هلهلة حيدر حيدر، ‌قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;پيش تر از من دلتنگ گذشتي ، بگذر&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT face=&quot;Georgia, Times New Roman, Times, Serif&quot; color=#330000 size=3&gt;ما همه مي گذريم آخر از اين در، قيصر!&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT face=&quot;Tahoma, Arial, Helvetica, sans-serif&quot; color=#330000&gt;       این غزل همزمان با مراسم دفن قیصر در گتوند و با یادش در دهلی نو سروده شد.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 13:39:18 GMT</pubDate>
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<dc:creator>ghazveh</dc:creator>
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</item>
<item>
<title>چقدر آهوي زخمي در شبستان تو مي‌چرخد </title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-223.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;خراسان در خراسان  نور در جان تو مي‌چرخد &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;مگر خورشيد در چاك گريبان تو مي‌چرخد؟ &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;خراسان مُهر دريا مي‌شود با گام‌هاي تو &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;به دست ابرها تسبيح باران تو مي‌چرخد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;اگر شوق وصالت نيست در آيينه‌ها، درها &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;چرا آيينه در آيينه، ايوان تو مي‌چرخد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;طواف عاشقان هم بر مدار چشم‌هاي توست &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;سماع صوفيان هم گرد عرفان تو مي‌چرخد&lt;/STRONG&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;به سقّاخانه ات زيباست رقص كاسه‌هاي نور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در اين پيمانه، آن پيمانه، پيمان تو مي‌چرخد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;بيابان در بيابان گرگ شد، هر كوه، صيّادي &lt;/STRONG&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;چقدر آهوي زخمي در شبستان تو مي‌چرخد &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در اين آدينه لبريز از آغاز گل، شاعر!&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;شروع تازه‌اي در بيت پايان تو مي‌چرخد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;                                                               شب میلاد امام رضا (ع) 1384&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;برگشته‌ام امشب به خود از راه نشابور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;شيرين دلکم يک دو دهن شوربخوان، شور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;اي سورۀ اعراف من، اي قبلۀ هشـتم&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در ظلمت من پنجـره‌اي بـاز کن از نـور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;اي طوس تو ميقات همه چلّه نشينان&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;آبي تري از نور، درخشان تري از طور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;از شهر سنـابـاد برايــم کفن آريــد&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;امّيد که با نام تو سر بر کنم از گور&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;در حادثه موساي به هوش آمده ماييم&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;سبحانک يا نورتر از نورتر از نور!&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;                                                          تیرماه 1378&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 29 Oct 2009 09:17:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=ghazveh&amp;postid=223</comments>
<dc:creator>ghazveh</dc:creator>
<guid>http://ghazveh.blogfa.com/post-223.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>روحم به چشم آمد و جانم به لب رسید</title>
<link>http://ghazveh.blogfa.com/post-222.aspx</link>
<description> 
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;جوحی به حج واجب ماه رجب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;همراه شیخنا که به درک رطب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;می خواست تا شراب طهوری دهد به ما&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;جوشید آنقدر که به آب عنب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;صبحی به منبر آمد و فرمود باک نیست&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;گر واجبات رفت به ما مستحب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;از نو صلا زدند که ما را وجب کنند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;از رای ها به شیخ همان یک وجب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;مشت و وجب برای همین آفریده شد&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;بی آنکه انتخاب شود منتخب رسید!&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;جمعی وضو نکرده دویدند در صفوف&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;آخر نماز جمعه نخواندند و شب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;صفین و نهروان و جمل نوش جانشان&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;این کوفیان که مِهر علی شان به سب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;هر کس که دم زد از ادب مرد حرف بود&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;هر کس که فحش داد به فیض ادب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;بعد از سه ماه شعبده رنگ و ننگ و زنگ&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;آیینه شکسته شان از حلب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;شکر خدا که عابد و زاهد به هم شدند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;این از جلو در آمد و آن از عقب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;دنبال کرسی اند بر این سنگ آسیا&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;دندان کرم خورده شان تا عصب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;با غرب و شرق مسخره بازان یکی شدند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;نوبت به ریشخند سران عرب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;گوساله های سامری از طور آمدند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;با سبز اشتری که بر آن بولهب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;چیزی نبود حاصل شان  از هجوم وهم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;جز مشت ریسمان که به کام حطب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;خاموشی ام مبین که در این آتش نفاق&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;روحم به چشم آمد و جانم به لب رسید&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT size=4&gt;                           آبان ماه ۱۳۸۸&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 27 Oct 2009 14:16:18 GMT</pubDate>
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<title>دنيا همه آيينۀ  شرمندگي ماست</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;دل خون شد و خنديد، ببينيد كَرَم را&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;ما گريه نكرديم مگر غربت هم را&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;دنيا همه آيينۀ  شرمندگي ماست&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;در حشر نبينيم مگر صورت هم را &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;خون شد دلم از غصّۀ مرگِ حسنك‌ها&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;يك چند بگريانم بگذار قلم را &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;اي عشق، همه كشتۀ شمشير تو هستيم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;حكم تو قصاص است ولي صاحب دَم را&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;در حلقۀ چشمت به خدا خطّ طوافي ست&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;كم مانده كه زلفت شكند حدّ حرم را &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;مانند حبيب عجمي دل عربي كن&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;در عشق نپرسند عرب را و عجم را&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;عمري كه دويديم هوس بود و عبث بود&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;با پاي توكّل برويم اين دو قدم را&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;                                                اردیبهشت ماه 1375&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;B&gt;&lt;BR clear=all&gt;&lt;/B&gt;</description>
<pubDate>Sat, 24 Oct 2009 13:06:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>دوشید فتنه­ای شتران دو ساله را...</title>
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<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;B&gt;  &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;EM&gt; شعری از محمد مهدی سیار شاعر خوب شیرازی را تقدیم تان می کنم. &lt;/EM&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;از حلقه­هایمان به­ در افتاد رازها&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;با قیل وقال بی­ثمر عشقبازها &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;دوشید فتنه­ای شتران دو ساله را&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;بر دوششان نهاد به بازی جهازها&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;شوخی شده­ست و عشوه نماز شیوخ شهر&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;رحمت به بی­نمازی ما بی­نمازها&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;خیل پیاده­ایم، کجا بازگو کنیم؟&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;رنجی که برده­ایم ز شطرنج­بازها&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt; ماییم و زخم خنجر و دست برادران &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt; ماییم و میزبانی این ترکتازها   &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;در پیش چشم کوخ نشینان غریب نیست &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;از کاه، کوه ساختنِ کاخ­سازها &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;قرآن به نیزه رفت... خدايا مخواه باز&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;بر نیزه­ها طلوع سر سرفرازها &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;در گنبد کبود زمان ما کبوتران&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;بستیم چشم و بسته نشد چشمِ بازها &lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;  ما را چه غم ز هرزه گیاهی که سبز شد&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;بر خاکمان مباد هجوم گرازها&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 10:32:18 GMT</pubDate>
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